प्राचीन मध्य तथा आधुनिक काल में वाद्य वर्गीकरण
Classification of Musical Instruments in Ancient, Medieval, and Modern Periods

उज्जवल

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, संगीत गायन, एम डी एस डी कॉलेज, अंबाला शहर

Ujjwal,

Assistant Professor (Music Vocal), MDSD College, Ambala City, Haryana, India

सार

प्रस्तुत शोधपत्र में भारतीय संगीत परंपरा में वाद्य यंत्रों के वर्गीकरण की अवधारणा का प्राचीन, मध्य तथा आधुनिक काल के संदर्भ में विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। वाद्य वर्गीकरण संगीत के अध्ययन की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है, जिसके माध्यम से वाद्य यंत्रों को उनकी ध्वनि उत्पादन विधि, बनावट तथा संगीत में उनकी भूमिका के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जाता है। प्राचीन काल में तत, अवनद्ध, सुषिर एवं घन—इन चार प्रमुख वर्गों के माध्यम से वाद्यों को समझा गया, जो आगे चलकर मध्य काल में नए विकसित वाद्यों के समावेश के साथ अधिक समृद्ध हुआ। आधुनिक काल में तकनीकी प्रगति के कारण विद्युत वाद्यों का विकास हुआ, जिससे वाद्य वर्गीकरण की परिधि और व्यापक हो गई। इस अध्ययन का उद्देश्य वाद्य वर्गीकरण की ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया, उसकी आवश्यकता तथा संगीत शिक्षा, वादन, निर्माण और अनुसंधान में उसके महत्व को रेखांकित करना है। शोधपत्र यह स्पष्ट करता है कि वाद्य वर्गीकरण न केवल संगीत के सैद्धांतिक अध्ययन को सरल बनाता है, बल्कि भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा और उसके सतत विकास को समझने में भी सहायक सिद्ध होता है। 

कुंजी शब्द : वाद्य वर्गीकरण; भारतीय संगीत; तत वाद्य; अवनद्ध वाद्य; सुषिर वाद्य; घन वाद्य; विद्युत वाद्य; ध्वनि उत्पादन; संगीत शास्त्र; वाद्य परंपरा

Abstract

This research paper presents an analytical study of the concept of musical instrument classification within the Indian musical tradition across the ancient, medieval, and modern periods. Instrumentation classification serves as a vital pedagogical and systematic framework, categorizing instruments based on their sound production techniques, structural design, and functional roles in music. In the ancient period, the “Chaturvidha” (four-fold) classification system categorized instruments into Tata (stringed), Avanaddha (percussion/membranophones), Sushira (wind), and Ghana (solid/idiophones). This system evolved during the medieval era with the integration and development of new instruments. In the modern era, technological advancements have led to the emergence of electronic and digital instruments, further broadening the scope of classification. The objective of this study is to highlight the historical evolutionary process of instrument classification, its necessity, and its significance in music education, performance, manufacturing, and research. The findings suggest that classification not only simplifies the theoretical study of musicology but also aids in understanding the rich heritage and continuous evolution of Indian music.

Keywords: Instrument Classification; Indian Music; Tata Vadya; Avanaddha Vadya; Sushira Vadya; Ghana Vadya; Electronic Instruments; Sound Production; Musicology; Musical Traditions.

डॉ. उज्ज्वल, अंबाला शहर के एमडीएसडी कॉलेज में गायन संगीत की सहायक प्रोफेसर हैं। वे भारतीय शास्त्रीय गायन संगीत में निपुण अकादमिक और व्यावहारिक विशेषज्ञता रखने वाली एक प्रशिक्षित कलाकार हैं। संगीत में एम.ए., एम.फिल., नेट-जेआरएफ और पीएच.डी. जैसी उच्च योग्यताएं उनकी संगीत शिक्षा और अनुसंधान में उत्कृष्टता के प्रति उनकी निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।

डॉ. उज्ज्वल ने अकादमिक जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उनके 10 शोध पत्र प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों, सम्मेलनों और कार्यशालाओं में शोध पत्र प्रस्तुत करके अकादमिक चर्चा में सक्रिय रूप से भाग लिया है। उनके विद्वतापूर्ण कार्य से भारतीय शास्त्रीय संगीत के सैद्धांतिक और प्रदर्शन-आधारित दोनों पहलुओं के प्रति उनकी गहरी रुचि झलकती है।

अपने शोध कार्यों के साथ-साथ, डॉ. उज्ज्वल स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर छात्रों को पढ़ाने और उनका मार्गदर्शन करने में भी सक्रिय रूप से शामिल हैं। वे अपने छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण के लिए जानी जाती हैं, जिसमें सिद्धांत, अभ्यास और प्रदर्शन कौशल के संतुलित एकीकरण पर जोर दिया जाता है। वे छात्रों को संगीत सौंदर्यशास्त्र, परंपरा और नवाचार की गहरी समझ विकसित करने के लिए निरंतर प्रेरित करने का प्रयास करती हैं।

संगीत प्रदर्शन, संगीत अनुसंधान, पाठ्यक्रम विकास और उच्च शिक्षा में अध्यापन उनकी रुचि के क्षेत्र हैं। डॉ. उज्ज्वल अकादमिक शोध, प्रदर्शन अभ्यास और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय संगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध हैं।

 

Dr. Ujjwal is an Assistant Professor of Vocal Music at MDSD College, Ambala City. She is a trained performer with strong academic and practical expertise in Indian classical vocal music. She holds advanced qualifications including M.A., M.Phil., NET–JRF, and Ph.D. in Music, reflecting her sustained commitment to excellence in music education and research.

Dr. Ujjwal has made significant academic contributions, with 10 research papers published in reputed national and international journals. She has actively participated in academic discourse by presenting research papers at various national and international seminars, conferences, and workshops. Her scholarly work demonstrates a keen engagement with both theoretical and performance-based aspects of Indian classical music.

Alongside her research activities, Dr. Ujjwal is deeply involved in teaching and mentoring students at undergraduate and postgraduate levels. She is known for her student-centric approach, emphasizing a balanced integration of theory, practice, and performance skills. She consistently strives to inspire students to develop a deep understanding of musical aesthetics, tradition, and innovation.

Her areas of interest include music performance, music research, curriculum development, and higher education teaching. Dr. Ujjwal remains committed to the preservation and promotion of Indian classical music through academic scholarship, performance practice, and community engagement.

Impact Statement

यहाँ प्रस्तुत अध्ययन “प्राचीन, मध्य तथा आधुनिक काल में वाद्य वर्गीकरण” संगीत-इतिहास की समझ को सुदृढ़ करते हुए भारतीय संगीत परंपरा की निरंतरता और विकासशील प्रवृत्तियों को स्पष्ट करता है। यह शोध प्राचीन काल के नाट्यशास्त्र एवं संगीत-शास्त्रों में वर्णित वाद्य वर्गीकरण से लेकर मध्यकालीन ग्रंथों तथा आधुनिक संगीत-व्यवस्था तक के परिवर्तनशील स्वरूप को विश्लेषित करता है। इसके माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार देश, काल और सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप वाद्य यंत्रों के वर्गीकरण, संरचना और प्रयोग में विकास हुआ है। यह अध्ययन संगीत के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और शिक्षकों को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ समकालीन संगीत को समझने का वैचारिक आधार प्रदान करता है तथा भारतीय संगीत धरोहर के संरक्षण, प्रलेखन और अकादमिक पाठ्यक्रम निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

Citation

APA 7th Style

Ujjwal. (2026). Classification of musical instruments in ancient, medieval, and modern periods [प्राचीन मध्य तथा आधुनिक काल में वाद्य वर्गीकरण]. Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal, 5(01), 23–26. https://doi.org/10.59231/SARI7888

Chicago 17th Style

Ujjwal. “Classification of Musical Instruments in Ancient, Medieval, and Modern Periods [प्राचीन मध्य तथा आधुनिक काल में वाद्य वर्गीकरण].” Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal 5, no. 1 (2026): 23–26. https://doi.org/10.59231/SARI7888.

MLA 9th Style

Ujjwal. “Classification of Musical Instruments in Ancient, Medieval, and Modern Periods [प्राचीन मध्य तथा आधुनिक काल में वाद्य वर्गीकरण].” Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal, vol. 5, no. 1, 2026, pp. 23-26, https://doi.org/10.59231/SARI7888.

भूमिका

वाद्य वर्गीकरण संगीत में वाद्य यंत्रों को उनकी विशेषताओं] बनावट और ध्वनि उत्पादन के आधार पर समूहों में विभाजित करने की एक प्रक्रिया है। यह वर्गीकरण संगीतकारों] विद्वानों और वाद्य निर्माताओं के लिए वाद्य यंत्रों को समझने उनका अध्ययन करने और उनका उपयोग करने में मदद करता है। वाद्य वर्गीकरण के मुख्य आधार ध्वनि उत्पादन का तरीका% वाद्य यंत्र ध्वनि कैसे उत्पन्न करते हैं| इसके आधार पर उन्हें वर्गीकृत किया जाता है। जैसे: कुछ वाद्य यंत्रों में ध्वनि तारों को हिलाकर उत्पन्न होती है| कुछ में हवा को कंपित करके और कुछ में वस्तुओं को टकराकर। 

बनावट: वाद्य यंत्रों की बनावट आकार और सामग्री के आधार पर भी उन्हें वर्गीकृत किया जाता है। 

उपयोग: वाद्य यंत्रों का उपयोग किस प्रकार के संगीत में किया जाता है| इसके आधार पर भी उन्हें वर्गीकृत किया जाता है। वाद्य वर्गीकरण के मुख्य प्रकार  तत् वाद्य ये वे वाद्य यंत्र हैं जिनमें ध्वनि तारों को हिलाकर उत्पन्न होती है। जैसे:  सितार, वीणा, गिटार आदि।  सुषिर वाद्य ये वे वाद्य यंत्र हैं जिनमें ध्वनि हवा को कंपित करके उत्पन्न होती है। जैसे: बांसुरी, शहनाई, तुरही आदि। अवनद्ध वाद्य ये वे वाद्य यंत्र हैं जिनमें ध्वनि चमड़े या किसी अन्य पदार्थ से बने पर्दे पर आघात करके उत्पन्न होती है। जैसे: तबला, ढोल, मृदंग आदि।  घन वाद्य ये वे वाद्य यंत्र हैं जिनमें ध्वनि किसी ठोस वस्तु को टकराकर उत्पन्न होती है। जैसे: मंजीरा, करताल, घंटियाँ आदि।

भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण का एक समृद्ध इतिहास रहा है। प्राचीन काल से ही वाद्यों को उनकी ध्वनि उत्पादन के आधार पर विभिन्न समूहों में वर्गीकृत किया जाता रहा है। यह वर्गीकरण न केवल वाद्यों की विशेषताओं को समझने में मदद करता है| बल्कि उनके विकास और उपयोग के इतिहास को भी जानने में सहायक होता है। प्राचीन काल प्राचीन काल में वाद्यों को मुख्य रूप से चार वर्गों में विभाजित किया गया था& तत वाद्य& वे वाद्य जिनमें ध्वनि तारों के कंपन से उत्पन्न होती है| जैसे वीणा, सितार, तानपुरा आदि।  अवनद्ध वाद्य वे वाद्य जिनमें ध्वनि चमड़े से मढ़े हुए सतह पर आघात करने से उत्पन्न होती है| जैसे: ढोल, तबला, मृदंग आदि।  घन वाद्य  वे वाद्य जिनमें ध्वनि ठोस वस्तुओं के आपस में टकराने से उत्पन्न होती है| जैसे मंजीरा, करताल, घंट आदि। सुषिर वाद्य वे वाद्य जिनमें ध्वनि हवा के प्रवाह से उत्पन्न होती है] जैसे                                                                                                                       बांसुरी, शहनाई, शंख आदि। मध्य काल मध्य काल में भी वाद्यों का वर्गीकरण प्राचीन काल के समान ही रहा | लेकिन इस काल में कुछ नए वाद्यों का भी विकास हुआ| जैसे: रबाब, सरोद, पखावज आदि। 

आधुनिक काल 

आधुनिक काल में वाद्यों के वर्गीकरण में कुछ परिवर्तन हुए हैं। अब वाद्यों को उनकी ध्वनि उत्पादन के साथ-साथ उनकी बनावट और उपयोग के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है। आधुनिक वर्गीकरण के अनुसार वाद्यों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है| 

तंतु वाद्य% वे वाद्य जिनमें ध्वनि तारों के कंपन से उत्पन्न होती है | जैसे वीणा, सितार, गिटार, वायलिन आदि। 

 अवनद्ध वाद्य:  

वे वाद्य जिनमें ध्वनि चमड़े से मढ़े हुए सतह पर आघात करने से उत्पन्न होती है | जैसे ढोल, तबला, मृदंग,  पखावज आदि। 

 सुषिर वाद्य: वे वाद्य जिनमें ध्वनि हवा के प्रवाह से उत्पन्न होती है | जैसे बांसुरी, शहनाई, क्लैरनेट, ट्रम्पेट आदि।  

घन वाद्य: वे वाद्य जिनमें ध्वनि ठोस वस्तुओं के आपस में टकराने से उत्पन्न होती है | जैसे मंजीरा, करताल,  घंट, झांझ आदि। 

विद्युत वाद्य: वे वाद्य जिनमें ध्वनि विद्युत के माध्यम से उत्पन्न होती है |जैसे सिंथेसाइज़र, इलेक्ट्रिक गिटार, इलेक्ट्रिक वायलिन आदि। यह वर्गीकरण वाद्यों को समझने और उनका अध्ययन करने में मदद करता है। इसके साथ ही यह संगीतकारों को विभिन्न प्रकार के वाद्यों का उपयोग करके नए संगीत रूपों की रचना करने के लिए प्रेरित करता है।

वाद्य वर्गीकरण की आवश्यकता 

संगीत के अध्ययन और समझ को सरल बनाने के लिए होती है। यह विभिन्न वाद्य यंत्रों को उनकी विशेषताओं] ध्वनि उत्पादन के तरीकों और संगीत में उनकी भूमिका के आधार पर समूहीकृत करने में मदद करता है। 

वाद्य वर्गीकरण के कुछ मुख्य कारण:

 अध्ययन में सरलता: वर्गीकरण के माध्यम से वाद्यों के बारे में जानकारी प्राप्त करना आसान हो जाता है। एक ही समूह के वाद्यों में कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं| जिससे उनके बारे में सीखना अधिक व्यवस्थित हो जाता है।  

ध्वनि की पहचान: वर्गीकरण से वाद्यों की ध्वनि को पहचानने में मदद मिलती है। विभिन्न समूहों के वाद्यों की ध्वनि में अंतर होता है] जिसे वर्गीकरण के आधार पर समझा जा सकता है।  

संगीत में भूमिका: वर्गीकरण से यह समझने में मदद मिलती है कि विभिन्न वाद्य संगीत में क्या भूमिका निभाते हैं। कुछ वाद्य लय प्रदान करते हैं| कुछ राग का विस्तार करते हैं और कुछ विशिष्ट भावों को व्यक्त करते हैं।  

वाद्यों का विकास: वर्गीकरण के माध्यम से वाद्यों के विकास का अध्ययन किया जा सकता है। समय के साथ वाद्यों के स्वरूप और ध्वनि उत्पादन के तरीकों में परिवर्तन होता है] जिसे वर्गीकरण के आधार पर ट्रैक किया जा सकता है। 

वाद्य वर्गीकरण के कुछ प्रमुख आधार

 उत्पत्ति% वाद्य किस प्रकार से ध्वनि उत्पन्न करते हैं| इसके आधार पर उनका वर्गीकरण किया जाता है। जैसे& तंतु वाद्य, अवनद्ध वाद्य, घन वाद्य और सुषिर वाद्य। आकार% वाद्यों के आकार और बनावट के आधार पर भी उनका वर्गीकरण किया जाता है। संगीत में भूमिका% वाद्य संगीत में क्या भूमिका निभाते हैं| इसके आधार पर भी उनका वर्गीकरण किया जाता है। जैसे: ताल वाद्य, राग वाद्य और सहायक वाद्य। वाद्य वर्गीकरण संगीत के अध्ययन और समझ के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। यह वाद्यों के बारे में जानकारी को व्यवस्थित करने और उनकी विशेषताओं को समझने में मदद करता है।

  वाद्य वर्गीकरण का महत्व

वाद्य यंत्रों को समझने में मदद% वाद्य वर्गीकरण हमें वाद्य यंत्रों की विशेषताओं उनकी ध्वनि उत्पादन के तरीके और उनके उपयोग के बारे में जानने में मदद करता है।  संगीतकारों के लिए उपयोगी% वाद्य वर्गीकरण संगीतकारों को विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों में से अपने संगीत के लिए उपयुक्त वाद्य यंत्रों का चयन करने में मदद करता है।  वाद्य निर्माताओं के लिए उपयोगी वाद्य वर्गीकरण वाद्य निर्माताओं को विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों के डिजाइन और निर्माण में मदद करता है।  संगीत के अध्ययन में सहायक% वाद्य वर्गीकरण संगीत के इतिहास विकास और विभिन्न संस्कृतियों में संगीत वाद्य यंत्रों के उपयोग के बारे में अध्ययन करने में सहायक होता है।

 निष्कर्ष:  वाद्य वर्गीकरण संगीत में वाद्य यंत्रों को समझने और उनका उपयोग करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। यह संगीतकारों विद्वानों वाद्य निर्माताओं और संगीत प्रेमियों सभी के लिए उपयोगी है।

Statements & Declarations (घोषणाएं )

पीयर-रिव्यू विधि (Peer-Review Method): This article underwent a rigorous double-blind peer-review process involving two external subject matter experts to ensure academic integrity and quality. इस शोध पत्र की समीक्षा दो बाहरी विशेषज्ञों द्वारा डबल-ब्लाइंड पीयर-रिव्यू प्रक्रिया के माध्यम से की गई है।

हितों का टकराव (Competing Interests): The author declares no potential conflicts of interest, financial or otherwise, that could inappropriately influence or bias the findings of this research. लेखक (उज्जवल) यह घोषणा करते हैं कि इस शोध के परिणामों को प्रभावित करने वाला कोई भी वित्तीय या व्यक्तिगत हितों का टकराव नहीं है।

वित्तीय सहायता (Funding): This research received no specific grant from any funding agency in the public, commercial, or not-for-profit sectors. इस शोध कार्य के लिए किसी भी सरकारी या निजी संस्था से कोई बाहरी वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं हुई है।

डेटा उपलब्धता (Data Availability): The data supporting the findings of this study are derived from publicly available ancient texts and historical musical treatises. Detailed analytical frameworks used in the study are available from the corresponding author upon reasonable request. इस अध्ययन में उपयोग किए गए प्राथमिक और द्वितीयक स्रोत (प्राचीन ग्रंथ और ऐतिहासिक दस्तावेज) सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। विश्लेषण का विवरण संबंधित लेखक से अनुरोध पर प्राप्त किया जा सकता है।

लाइसेंस (Licence): Classification of Musical Instruments in Ancient, Medieval, and Modern Periods © 2026 by Ujjwal is licensed under CC BY-NC-ND 4.0. This license allows others to download the work and share it with others as long as they credit the author, but they cannot change it in any way or use it commercially. Published by ICERT. प्राचीन मध्य तथा आधुनिक काल में वाद्य वर्गीकरण © 2026 उज्जवल द्वारा CC BY-NC-ND 4.0 के तहत लाइसेंस प्राप्त है। इसे ICERT द्वारा प्रकाशित किया गया है।

नैतिकता अनुमोदन (Ethics Approval): As this study is based on the review and analysis of historical literature and ancient musical texts (secondary research) and did not involve direct interaction with human or animal subjects, it was deemed exempt from formal ethical review by the Research Committee of MDSD College, Ambala City. चूंकि यह शोध ऐतिहासिक ग्रंथों और साहित्य की समीक्षा पर आधारित है और इसमें मानव या पशुओं पर कोई प्रत्यक्ष प्रयोग शामिल नहीं है, इसलिए इसे एम.डी.एस.डी. कॉलेज (MDSD College), अंबाला शहर की अनुसंधान समिति द्वारा नैतिक समीक्षा से छूट (Exempt) दी गई है।

संदर्भ सूची
  1. डॉ. नीलू रानी. संगीत शास्त्र एवं वाद्य सिद्धांत. पृष्ठ संख्या 38.

  2. लाल मणि मिश्र. भारतीय संगीत वाद्य. पृष्ठ संख्या 67.

  3. सुशील कुमार घोष. वाद्य परिचय. पृष्ठ संख्या 42.

  4. डॉ. प्रेमलता शर्मा. भारतीय संगीत वाद्य: एक परिचय. पृष्ठ संख्या 102.

  5. आचार्य बृहस्पति. वाद्य वर्गीकरण. पृष्ठ संख्या 59.

  6. Singh, B. (2024). Usefulness and challenges of distance learning system in classical music. Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal03(01), 196–209. https://doi.org/10.59231/sari7665

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