वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा की उपयोगिता व महत्व
देवी, सुमन
हिन्दी विभाग, सहायक प्रोफेसर, एन.आई.आई.एल.एम. विश्वविद्यालय, कैथल
The Utility and Importance of Hindi Language in the Global Context
Devi, Suman
Assistant Professor, Department of Hindi, NIILM University, Kaithal, Haryana, India.
सारांश
भारत एक बहुभाषीदेश है, भारत में बोलने वालों की संख्या तथा भौगोलिक दृष्टि से हिंदी केंद्रीय महत्व की भाषा है। आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी का वर्चस्व दृष्टिगोचर है। लगभग 80 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा प्रयोग की जानेवाली हिंदी भाषा ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। हिंदी भाषा की सरलता, सहजता व भाव अभिव्यक्ति की श्रेष्ठतम योग्यता के कारण मॉरीशस, त्रिनिदाद, फिजी, सूरीनामा, गुयाना आदि देशों में हिंदी का प्रयोग प्रवासी भारतीयों द्वारा किया जाता है। अमेरिका, फ्रांस, सूरीनामा, चीन, सूडान, हांगकांग, ऑस्ट्रेलिया आदि राष्ट्रों में हिंदी शिक्षा की विशेष व्यवस्था है। अमेरिका में लगभग 150 ऐसे शिक्षण केंद्र हैं जहाँ हिंदी का अध्ययन व अध्यापन करवाया जाता है।
हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने में बहुराष्ट्रीय एजेंसियां, विज्ञापन चैनलों, उपग्रह चैनलों का विशेष महत्व है। हिंदी भाषा की प्रमुख विशेषता तथा इसके सर्वव्यापी बनने का प्रमुख आधार है। इसके संस्कृत के शब्दों उपसर्ग व प्रत्ययों के आधार पर नये शब्द गढ़ने की क्षमता है, जिसके परिणामस्वरूप ही हिंदी भाषा में उच्चकोटि का साहित्य विपुल मात्रा में पाया जाता है। हिंदी भाषा के पास लगभग 25 लाख से अधिक शब्दों का शब्दभंडार है। हिंदी भाषा को विश्व प्रसिद्ध बनाने व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का विशेष योगदान रहा है। हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत करने में अनुवाद का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अनुवाद के द्वारा दूसरी भाषाओं में लिखित सामग्री को हिंदी भाषा के माध्यम से देश के बहुसंख्यक लोगों तक पहुंचाया जाता है।
हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान विदेशी-प्रवासी भारतीयों का है जो लगभग 200 वर्ष पहले खेतिहर मजदूरों के रूप में विदेशों में अलग-अलग स्थानों पर पहुंचे थे। भारतीय मूल के लोग विदेश में जाकर वहीं के होकर रह गये तथा इन्होंने हमारी राजभाषा हिंदी को विदेशों में पहुँचाने का कार्य किया। दक्षिण अफ्रीका, सूरीनामा, त्रिनिदाद, फिजी, मॉरीशस आदि में अनेकों ऐसे भारतीय मूल के व्यक्ति मिल जाते हैं जिनके पूर्वज पांच-छह पीढ़ी पूर्व विदेशों में गये थे। इन प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को सुदूर देशों में प्रसारित करने का कार्य किया है। मॉरीशस में प्रथम अखबार ‘हिन्दुस्तानी’ 1913 ई॰ में तथा प्रथम पत्रिका ‘दुर्गा’ नाम से प्रथम हस्तलिखित साहित्यिक व सांस्कृतिक पत्रिका प्रारम्भ हुई।
आज हिंदी का ज्ञान अर्जित करने के लिए विद्यार्थियों की रुचियाँ व अभिरुचियाँ भी अलग-अलग हैं जैसे हिंदी साहित्य का अध्ययन अनुवाद के लिए, भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, सभ्यता व संस्कृति का अध्ययन, योग व शिक्षणपद्धति का अध्ययन इत्यादि। विगत कुछ वर्षों से छात्र हिंदी विषय का अध्ययन करने के लिए विदेशों से भारत में आ रहे हैं। भारत कई स्थानों पर हिंदी शिक्षण के अध्ययन की व्यवस्था की गई है। भारतवर्ष में कुछ प्रमुख शिक्षण संस्थानों जैसे महात्मागांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी और दिल्ली विश्वविद्यालय आदि द्वारा भारत में विदेशी छात्रों को हिंदी पढ़ाने की विशेष व्यवस्था की जाती है।
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिंदी को स्वीकृति दिलवाने के लिए विश्व हिंदी सम्मेलन की शुरुआत हुई। 1975 ई॰ में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में भारत के नागपुर शहर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ। अब तक कुल 12 विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य भी हिंदी भाषा का प्रसार-प्रचार तथा वैश्विक सन्दर्भ में हिंदी को समस्त जनता तक पहुंचाने के उद्देश्य से हुआ।
प्रमुख शब्द: बहुभाषीदेश, अंतर्राष्ट्रीय, राजभाषा, प्रवासी भारतीय, सभ्यता व संस्कृति, विश्व हिंदी सम्मेलन।
Abstract
India is a multilingual country where Hindi holds central importance due to its large number of speakers and wide geographical reach. Today, Hindi is gaining recognition at the international level as well. More than 800 million people speak Hindi, and its significance is increasing even in the United Nations. Because of its simplicity, natural flow, and expressive ability, Hindi is spoken by Indian diaspora communities in Mauritius, Trinidad, Fiji, Suriname, and Guyana. Several countries, including the United States, France, China, Sudan, Hong Kong, and Australia, have special arrangements for Hindi education.
Multinational agencies, advertising channels, and satellite media have played an important role in giving Hindi global recognition. Its ability to form new words using Sanskrit prefixes and suffixes has helped create an extensive vocabulary, resulting in a rich body of literature. Hindi newspapers, magazines, and translation work have also significantly contributed to spreading Hindi internationally.
The Indian diaspora, who migrated as laborers nearly 200 years ago, have played a major role in taking Hindi to distant countries. Due to their efforts, Hindi is well established in Fiji, Mauritius, Suriname, Trinidad, and other nations. In Mauritius, the first Hindi newspaper Hindustani was published in 1913, along with the first handwritten literary and cultural magazine Durga.
Interest among foreign students in learning Hindi has also grown. Institutions such as Mahatma Gandhi International Hindi University (Wardha), Banaras Hindu University, and the University of Delhi provide special facilities for Hindi education to foreign learners.
To give Hindi recognition on the global stage, the World Hindi Conference was initiated. The first conference was held in 1975 in Nagpur under the leadership of Prime Minister Indira Gandhi. So far, twelve conferences have been held, with the main objective of promoting the Hindi language and spreading it globally.
Keywords: Multilingual country, International, Official language, Indian diaspora, Civilization and culture, World Hindi Conference.
About The Author
Dr. Suman Devi is an accomplished Assistant Professor in the Department of Hindi at NIILM University, bringing approximately five years of academic and research experience to her role. She holds an extensive educational background, including a Ph.D., NET, M.A., B.Ed., and PGDCA. Her scholarly work is primarily focused on prose literature (Gadya Sahitya), a field in which she has published numerous research papers in esteemed journals such as Drishtikon, Madhya Bharti, and Juni Khyat. Her publications cover a wide array of critical themes, including social consciousness in Kabir’s poetry, women’s struggles in contemporary fiction, and discourses on Dalit and farmer issues in Hindi literature. Beyond journal articles, she has authored the book “Yugbodh in Stories of Contemporary Women Storytellers” (ISBN: 978-81-972647-3-3). Dr. Suman is also a frequent contributor to the wider academic community, having presented over twelve papers at national and international seminars on diverse topics ranging from spiritual values in the Shrimad Bhagwat Gita to the impact of globalization on the Hindi language. Committed to continuous professional growth, she has successfully completed multiple teacher training programs under the Malviya Mission and actively participates in multidisciplinary workshops and national symposiums to further her expertise in higher education and sustainable development.
Impact Statement
वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा की उपयोगिता व महत्त्व” विषय पर आधारित यह अध्ययन हिंदी भाषा की बढ़ती वैश्विक भूमिका को रेखांकित करते हुए उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा आर्थिक महत्व को स्पष्ट करता है। यह शोध दर्शाता है कि वैश्वीकरण के दौर में हिंदी न केवल भारत की संपर्क भाषा के रूप में सशक्त हुई है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार, सूचना-प्रौद्योगिकी, मीडिया, कूटनीति और शिक्षा के क्षेत्रों में भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रही है। अध्ययन यह भी प्रतिपादित करता है कि हिंदी भाषा सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक समावेशन और भाषायी लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देने का सशक्त माध्यम बन रही है। इस प्रकार यह शोध नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों और भाषा-अध्येताओं को हिंदी के संवर्धन, प्रचार-प्रसार और वैश्विक स्तर पर उसकी उपयोगिता बढ़ाने हेतु ठोस दिशा प्रदान करता है तथा हिंदी को एक सशक्त वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
Citation
APA 7th Style Citation
Devi, S. (2026). The utility and importance of Hindi language in the global context [वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा की उपयोगिता व महत्त्व]. Shodh Sari – An International Multidisciplinary Journal, 5(01), 27–33. https://doi.org/10.59231/SARI7889
Chicago 17th Style Citation
Devi, Suman. “The Utility and Importance of Hindi Language in the Global Context [वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा की उपयोगिता व महत्त्व].” Shodh Sari – An International Multidisciplinary Journal 5, no. 1 (2026): 27–33. https://doi.org/10.59231/SARI7889.
MLA 9th Style Citation
Devi, Suman. “The Utility and Importance of Hindi Language in the Global Context [वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा की उपयोगिता व महत्त्व].” Shodh Sari – An International Multidisciplinary Journal, vol. 5, no. 1, 2026, pp. 27-33, https://doi.org/10.59231/SARI7889.
प्रस्तावना: भाषा भाव अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम
भाषा भाव अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होती है। भारतवर्ष में हिंदी बहुतायत मात्रा में बोली और समझी जाती है। आज दुनिया में लगभग साठ हजार भाषाओं को बोला व समझा जाता है, परन्तु अधिकतर भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है। भाषाओं के इस विलुप्तिकरण के दौर में हिंदी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। भारत में हिंदी लगभग 44 प्रतिशत लोगों के द्वारा प्रयोग की जाती है परन्तु वैश्विक स्तर पर भी पिछले दो दशकों में हिंदी के प्रयोग व क्रियाकलापों में वृद्धि हुई है।
भाषा की नियति बोलने वालों से जुडी हुई होती है, किसी भाषा को बोलने वाले जितनी अधिक मात्रा में होंगे उस भाषा का विकास उसी स्तर के अनुसार होगा। हिंदी जहाँ भारत में करोड़ों लोगों की मातृभाषा है वहीं विश्व में अनगिनत लोगों की अनुराग भाषा भी है। विदेश में रह रहे प्रवासी भारतीय चाहे वे शिक्षा के उद्देश्य से विदेश गये हो या फिर किसी अन्य कारण से, वे हिंदी भाषा के वैश्विक स्तर पर प्रचार व प्रसार में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान देते हैं।
विश्वभाषाओं के सर्वेक्षण से पता चलता है कि हिंदी भाषा के व्यावसायिक तथा व्यावहारिक उपयोगिता के प्रतिशत में निरंतर वृद्धि हुई है। हिंदी बोले जाने वालों की संख्या तथा भूमिगत विस्तार के आधार पर भी विश्व की प्रधान भाषाओं में अपना स्थान रखती है। हिंदी भारत की मातृभाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा है। भारत के अलावा विदेशों में – फिजी, मॉरीशस, सूरीनामा, नेपाल, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों के स्थायी नागरिक भी हिंदी भाषा को मातृभाषा के रूप में उपयोग करते हैं।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
विश्व में बोलने वालों की संख्या के आधार पर हिंदी तीसरे स्थान पर है। आधुनिक सर्वे के अनुसार 2022 में 150 करोड़ लोग अंग्रेजी, 110 करोड़ लोग मंदारिन तथा 60 करोड़ लोग हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं। हिंदी भाषा की विकास दर तीव्र तथा अन्य भाषाओं की अपेक्षा स्पष्ट है।
‘संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया, परन्तु इसके साथ ही यह भी कहा गया कि 15 वर्षों तक सभी राजकीय कार्य राजभाषा में होंगे, परिणामस्वरूप हिंदी नाममात्र की राजभाषा बनकर रह गई। अगर संसद चाहती तो पन्द्रह वर्षों के पश्चात हिंदी को पूर्णतः राजभाषा बनाकर उसके साथ अंग्रेजी के सहयोग को समाप्त कर सकती थी परन्तु ऐसा नहीं हुआ तथा संसद ने 1963 ई॰ में एक अधिनियम पास किया, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजी के प्रयोग को अनिश्चित काल के लिए मान्यता दे दी गई। एक बार फिर से देश के निर्माताओं ने हिंदी के साथ छल किया।’¹
पिछले छह-सात वर्षों से उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालयों ने भी हिंदी में याचिका स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया है। प्रारम्भ में मुगलों ने उर्दू को कचहरिया की भाषा बनाया था, जिसका कुछ न कुछ प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। आज न्यायालयों में उर्दू का स्थान अंग्रेजी ने ले लिया है। हिंदी भाषा का अधिक मात्रा में प्रयोग नहीं किया जाता। संचार क्रांति के पश्चात हिंदी का विकास तेजी से हुआ है। हिंदी के विकास को तीव्रता से बढाने का कार्य सिनेमा जगत, पर्यटन व प्रवासियों ने प्रमुख रूप से किया है।
‘वर्तमान समय में भारत सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए प्रयासरत है।’²
अनुवाद
हिंदी भाषा में अध्ययनरत युवाओं के लिए इस क्षेत्र में सुनहरे भविष्य के अवसर हैं- अनुवाद व पत्रकारिता के क्षेत्र में। हिंदी क्षेत्र में रोजगार के भी अवसर पर्याप्त हैं। भारत में अनेक शिक्षण संस्थानों व विश्वविद्यालयों के द्वारा दूसरी भाषाओं की सामग्री को हिंदी भाषा में अनुदित किया जाता है। अतः इन संस्थानों में अनेक युवाओं को रोजगार प्राप्त होता है। इस प्रकार से अलग-अलग भाषाओं में ख्याति प्राप्त लेखकों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया जाता है। अतः अनुवाद कार्य में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। अनुवाद के महत्व को दृष्टिगोचर करते हुए अर्जुन चौहान लिखते हैं-
‘आज ज्ञान-विज्ञान की सामग्री, कार्यालयी सामग्री, वाणिज्य विषयक सामग्री, तकनीकी सामग्री, रचना एवं प्रौद्योगिकी की सामग्री और साहित्यिक सामग्री अनुवाद होना दुनिया के प्रत्येक राष्ट्र व समाज की आवश्यकता बनी हुई है। अतः अनुवाद क्षेत्र वर्तमान युवा पीढ़ी को रोजगार के अवसर प्रदान कर रहा है। विशेषतः हिंदी अनुवाद की आवश्यकता स्वाधीन भारत की और भारतवासियों की आवश्यकता है। जहाँ अधिक लोग हिंदी जानते हैं, मानते व समझते हैं, जहाँ की जनता हिंदी को अपनाती है और जहां आम आदमी हिंदी का प्रयोग करता है और जन-मन ही हिंदीमय बन जाता है वहां ज्ञान-विज्ञान व श्रेष्ठ साहित्य कृतियों के अनुवाद की मांग होना स्वाभाविक है। अतः हिंदी अनुवाद की मांग होना भी स्वाभाविक है।’³
आज विपुल मात्रा में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। अन्य भाषाओं से हिंदी क्षेत्र में पत्र-पत्रिकाओं का अनुवाद भी हिंदी क्षेत्र में रोजगार के अवसर प्रदान करता है। एक हिंदी विषय का अध्येता जो हिंदी के साथ-साथ अगर दूसरी भाषाओं का भी जानकार है तो उसे प्रिन्ट मीडिया में भी रोजगार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकता है। हिंदी को देश व विदेशों में लोकप्रिय बनाने में दूरदर्शन व रेडियो की अहम् भूमिका रही है। आज जीवन के हर क्षेत्र व्यापार, बाजार, मनोरंजन, शिक्षा, विज्ञापन सभी उद्देश्यों से हिंदी को लोकप्रियता प्रदान की है। भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी हिंदी की लोकप्रियता को नकारा नहीं जा सकता।
हिंदी भाषा के वैशिष्ट्य को स्पष्ट करते हुए ऋषभदेव शर्मा लिखते हैं-
‘हिंदी सब प्रकार की छुआछूत से मुक्त उदार भाषा होने के साथ-साथ भली प्रकार नियमबद्ध भाषा है, इसलिए यह बाजार से लेकर मीडिया तक ही नहीं, पुरातन विद्याओं से लेकर आधुनिक अनुशासनों तक की अभिव्यक्ति में पूर्ण सक्षम है। यह तो मानी हुई बात कि हिंदी सीखना बहुत आसान है। यह मानना होगा कि बाजार, फिल्म, विज्ञापन, सोशल मीडिया, व्यापार व्यवसाय, राजनीति आदि को आज दुनिया के व्यवहार क्षेत्र में अपनाना कोई मुश्किल काम नहीं।’⁴
हिंदी भाषा के विकास में चुनौतियाँ
दक्षिण भारतीय भाषाओं की लिपि हिंदी से पूर्णतः अलग होने पर दक्षिणभाषी लोगों की हिंदी समझने में असहजता।
प्रत्येक भाषा की अपनी व्याकरणिक विभिन्नता।
पारिभाषिक शब्दावली की समस्या।
प्रौद्योगिक क्षेत्र में समानार्थी शब्दों का अभाव।
समाधान
परिभाषिक शब्द प्रयोग एवं प्रसार पर बल देना।
परिभाषिक शब्द प्रयोग हेतु संचार माध्यमों का सहयोग लेना।
हिंदी को कम्प्यूटर की अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थान प्रदान करना।
इंटरनेट पर हिंदी विषय की आधिकारिक व प्रामाणिक विषय-वस्तु की उपलब्धता व विस्तार करना।
हिंदी व संस्कृति के शब्दकोशों का विकास तथा सरलीकरण का प्रयास करना।
हिंदी कवि व लेखकों को ऑनलाइन एक्सेस प्रदान करना।
हिंदी साहित्यकारों को अपने लेखन व साहित्य में योगदान के लिए आर्थिक सहायता व अन्य प्रकार की मदद करना।
हिंदी भाषा के विकास तथा हिंदी को ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से 1997 में महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) की स्थापना हुई। इस विश्वविद्यालय के द्वारा अनुवाद, साहित्य, भाषा, संस्कृति, प्रबंध, मानविकी सामाजिक विज्ञान आदि विषयों के अध्ययन के साथ-साथ कोश ग्रन्थों व शोधपरक ग्रंथों के निर्माण का कार्य किया जा रहा है।
आजादी से पूर्व भारतवासियों को अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत करने तथा देश के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने के लिए समाज के प्रतिभावान व्यक्तियों, नेताओं, पत्रकारों ने हिंदी भाषा को माध्यम बनाकर भारतवासियों को अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागृत करने के कार्य किया। हिंदी भाषा के वैश्विक स्तर पर विस्तार को इंगित करते हुए डॉ॰ अरुणा रामी लिखती हैं-
“हिंदी को अपने राष्ट्रभाषा क्षेत्र से दूर जाकर ग्लोबल भाषा बनना पड़ेगा, क्योंकि भारत से बहार लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन व अध्यापन की व्यवस्था है।”⁵
वर्तमान समय में सोशल मीडिया हिंदी भाषा के लिए सकारात्मक पहलू के रूप में उभर कर सामने आया है। आज का युवा वर्ग सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय व्यतीत करता है अतः प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से वह हिंदी भाषा के संपर्क में रहता है। अध्ययन करने पर पाया गया है कि सोशल मीडिया पर की जाने वाली खोजों में अंग्रेजी भाषा की अपेक्षा हिंदी भाषा का अधिक उपयोग किया जाता है तथा सोशल मीडिया पर हिंदी भाषी व्यक्तियों की संख्या अधिक है। एक सर्वे के अनुसार-
“स्टोरीनोमिक्स नामक संस्था ने दस भाषाओं अंग्रेजी, हिंदी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, पंजाबी, तमिल और तेलगु के 135 अग्रणी भारतीय मीडिया द्वारा सांझा किये गये तथा 8700 सन्देशों का अध्ययन करने पर पाया गया कि अंग्रेजी की तुलना में सोशल मीडिया पर हिंदी सन्देश बहुत अधिक सांझा किये जा रहे हैं।”⁶
किसी भी भाषा के प्रचार व प्रसार में संचार माध्यमों का विशिष्ट योगदान होता है। हिंदी भाषा के प्रचार व प्रसार में दूरदर्शन, रेडियो, इंटरनेट, पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है-
“अंतर्वैयक्तिक से लेकर समूह संचार और उससे आगे जाकर जनसंचार और अब वेब मीडिया तक की सीढी को तय करने में मानव सभ्यता ने एक लम्बी यात्रा तय की है। आज विश्व पटल पर विस्तार पाते वेब आधारित मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही है।”⁷
हिंदी भाषा के वैश्विक स्तर पर प्रसारित व प्रचार होने के अनेकों कारण रहे हैं। फिजी में प्रारम्भ में गन्ने व चीनी मिलों में काम करने के लिए भारतवर्ष के अलग-अलग भागों से भारतीयों को ले जाया जाता था। ये भारतीय अपने साथ अपनी भाषा, संस्कृति व धार्मिक संस्कारों को भी लेकर गये। इन्हें कलकत्ता शहर से पानी के जहाजों के द्वारा फिजी तथा अन्य विदेशी स्थानों पर पहुंचाया गया। एक साथ जहाजों में विदा होने के कारण इन भारतवासियों को ‘जहाजी भाई’ तथा ‘कलकतिया’ नाम भी दिया गया। इस काल में भारतीय पूर्वजों पर अनेक तरह के अत्याचार हुए तथा उन्हें संघर्षों का भी सामना करना पड़ा।
प्रारम्भ में फिजी में हिंदी भाषा का विरोध भी किया गया। इसी समय भारतीयों के लिए एक मसीहा के रूप में अंग्रेज पादरी सी॰ एफ॰ एन्ड्रूज आए तथा उन्होंने हर पक्ष से भारतीयता व भारतीयों के समर्थन किया तथा हिंदी भाषा को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। इस समय तक हिंदी प्रवासी भारतीयों की संपर्क भाषा का स्थान ले चुकी थी। किसी भी संस्थान में कार्य करने वाले कर्मचारियों से सही व औचित्यपूर्ण बातचीत के लिए, उनसे वार्तालाप के लिए उनकी भाषा से अवगत होना भी आवश्यक है। अतः प्रारम्भ में विदेशों में भारतीयता को समझने के लिए कुछ हद तक औपनिवेशिक अधिकारियों व कर्मचारियों को भी भारतीयों की भाषा सीखनी पड़ी। इस तरह भारतीय भाषाओं व विदेशी भाषाओं के शब्द आपस में मिल-जुल गए।
प्रवासी भारतीयों ने अपने संघर्ष के दिनों में हिन्दी भाषा तथा अपनी संस्कृति को एक नई दिशा प्रदान की और इन्होंने हिंदी साहित्य में एक नये विमर्श को जन्म दिया, जिसे ‘हिंदी प्रवासी साहित्य’ के नाम से जाना जाता है। कमल किशोर गोयनका प्रवासी साहित्य की विशिष्टता को दृष्टिगोचर करते हुए लिखते हैं-
“हिंदी प्रवासी साहित्य हिंदी के विराट संसार का अंग है। उसने अपनी विशिष्ट संवेदना, दृष्टिकोण, परिस्थिति और सृजन प्रक्रिया के कारण प्रवासी हिंदी साहित्य को एक मौलिक रूप प्रदान करके हिंदी संसार में अपना योगदान दिया।”⁸
विदेशों में लिखा जा रहा साहित्य हमेशा से ही भारतीयता से प्रभावित रहा है। हिंदी साहित्य के कथाकारों में नागार्जुन, निर्मल वर्मा, राहुल सांकृत्यायन तथा महिला साहित्यकारों में उषा प्रियंवदा, सुषमा वेदी, सुधा ओम ढींगरा, रेणु गुप्ता आदि ने किसी न किसी रूप में विदेशी प्रवेश में कुछ समय बिताया तथा अपने अनुभवों के आधार पर भारतीय व विदेशी जीवनशैलियों का चित्रण अपने साहित्य के माध्यम से किया है। इस सन्दर्भ में बात करते हुए अनिल कुमार प्रभाकर लिखते हैं-
“विदेशों में लिखी गयी कहानियों की जन्मभूमि अलग जरुर है पर पूरी तरह से विदेशी भी नही कह सकते हैं। उसकी मिट्टी में खाद भारत की मिली हुई है। तभी तो वह हिंदी कहानियाँ हैं नहीं तो कुछ भी हो सकती थी।”⁹
Statements and Declarations (घोषणाएं)
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Data Availability / डेटा उपलब्धता: The study is based on secondary data and literary sources available in the public domain. Additional information is available from the corresponding author upon reasonable request. यह अध्ययन सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध द्वितीयक डेटा और साहित्यिक स्रोतों पर आधारित है। अतिरिक्त जानकारी उचित अनुरोध पर संबंधित लेखिका से प्राप्त की जा सकती है।
Licence / लाइसेंस: The Utility and Importance of Hindi Language in the Global Context © 2026 by Suman Devi is licensed under CC BY-NC-ND 4.0. Published by ICERT. यह लेख © 2026 सुमन देवी द्वारा CC BY-NC-ND 4.0 के तहत लाइसेंस प्राप्त है। इसे ICERT द्वारा प्रकाशित किया गया है।
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सन्दर्भ
जी॰ एस॰ पांडे, भारतीय संविधान का कानून, 1491 एडिशन, 2019, यूनिवर्सिटी बुक हाउस प्राइवेट लिमिटेड
जे॰ बी॰ कृपलानी, गांधीजी के विचार व जीवन दृष्टि, रिवाइज्ड एडिशन 1991
अर्जुन चौहान, मीडियाकालीन हिंदी स्वरूप एवं सम्भावनाएं, पृष्ठ संख्या 15
ऋषभदेव शर्मा, हिंदी भाषा के बढ़ते कदम, तेज प्रकाशन नई दिल्ली, वर्ष 2005, पृष्ठ संख्या 305
डॉ॰ अरुणा रानी, शोध दिशा पत्र प्रकाशन, हिंदी साहित्य निकेतन, पृष्ठ संख्या 52
नमिता मिश्रा, सोशल मीडिया में हिंदी का प्रयोग, हिंदीकुंज
शैलेंद्र कुमार, ‘वेब मीडिया के विस्तार में विश्व भाषा हिंदी की भूमिका’, संपादक शर्मा मनीष, विश्व पटल पर हिंदी, रंग प्रकाशन, इन्दौर, पृष्ठ संख्या 37
कमल किशोर गोयनका, हिंदी प्रवासी साहित्य, यश पब्लिकेशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 42
प्रवासी जगत, संपादक डॉ॰ गंगाधर वानोडे, नावा पब्लिकेशन, पृष्ठ संख्या 16
Tapasya Chauhan. “Evaluation of the Changing Nature of Indian Education Policies.” Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal, vol. 04, no. 01, Jan. 2025, pp. 111–17. https://doi.org/10.59231/sari7782.
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