Eduphoria - An International Multidisciplinary Magazine
Vol.04, Issue 02 (Apr-Jun 2026)
An International scholarly/ academic magazine, peer-reviewed/ refereed magazine, ISSN : 2960-0014
A History of Environmental Thought and Action
Prof. Ritu Bhardwaj
Pt. Deen Dayal Upadhyaya Management College, Meerut
पर्यावरणीय विचार एवं क्रिया का इतिहास
प्रो0 ऋतु भारद्वाज
पं0 दीन दयाल उपाध्याय मैनेजमेन्ट कालिज मेरठ
शोध सार
सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड के ज्ञात ग्रहों में पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जहाँ पर जीवन विद्यमान है। मानव का यह कर्त्तव्य बनता है कि जीव जगत् के अस्तित्व के लिए पर्यावरणीय तत्वों का संरक्षण करें। किन्तु आज वैश्विक ताप में वृद्धि से हिमशिखरों का तीव्रता से हिमस्खलन, भूकम्प] चक्रवात] वायु का तीव्रता से प्रदूषित होना जैसी पर्यावरण सम्बन्धी गम्भीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। यदि समय रहते इन आपदाओं को रोकने का प्रयास नहीं किया गया तो पृथ्वी पर जीवों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न होगा।
वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक पर्यावरण संरक्षण तथा प्रदूषण नियन्त्रण हेतु समय-समय पर विभिन्न कालों में सामन्जस्य स्थापित किया गया] जिसमें पर्यावरण संरक्षण] प्राकृतिक घटकों के सदुपयोग उनके प्रति आस्था एवं चिन्तन को विस्तारित किया जाता रहा है। परिणामतः यह संरक्षण कभी पंच तत्वों के प्रति आस्था, कभी जागरूकता] कभी सम्मेलन तो कभी आन्दोलन के रूप में परिलक्षित हुआ है। यह विचार वास्तव में एक वैश्विक चुनौती है। अतः हम सभी को पर्यावरण संरक्षण के लिए मिलकर कार्य करने की आवश्यकता है।
मुख्य बिन्दुः पंच तत्व, वैश्विक चुनौती, सामन्जस्य, हिम शिखर, प्राकृतिक घटक
Abstract
Of all the known planets in the universe, Earth is the only planet where life exists. It is humanity’s duty to conserve environmental elements for the survival of living beings. However, global warming is causing serious environmental problems such as rapid avalanches, earthquakes, cyclones, and severe air pollution. If these disasters are not prevented in time, the existence of life on Earth will be threatened.
From the Vedic period to the present, coordination has been established over time for environmental protection and pollution control, which has expanded the focus on environmental conservation, the proper use of natural resources, and the expansion of faith and thought. Consequently, this conservation has sometimes manifested as faith in the five elements, sometimes as awareness, sometimes as conferences, and sometimes as movements. This idea is truly a global challenge. Therefore, we all need to work together to protect the environment.
Keywords: Five Elements, Global Challenge, Harmony, Snow Peak, Natural Elements
About the Author
Prof. Ritu Bhardwaj is an esteemed academician currently serving at Pt. Deen Dayal Upadhyaya Management College, Meerut. She is a prolific researcher with more than 65 research papers published in International, National, Refereed, and Reference journals with high impact factors. Her academic contributions include eight chapters published at the National and State levels and three authoritative books on various subjects within Teacher Education. Her work focuses on the intersection of traditional philosophy, modern education, and social accountability.
Impact Statement
This research provides a vital bridge between ancient Indian ecological wisdom and modern environmental policy. By exploring the “Pancha Tattva” (five elements) and their roles in Vedic and Buddhist traditions, the study re-establishes nature as a sacred entity rather than a mere resource for exploitation. The analysis of movements like Bishnoi and Chipko serves as an educational framework for community-led conservation. It emphasizes that solving global challenges like climate change requires a return to sustainable lifestyles rooted in historical knowledge and education. The study impacts current policy discourse by showing that successful environmental action in India must be culturally integrated and educationally driven.
Cite This Article
APA Style (7th Edition): Bhardwaj, R. (2026). पर्यावरणीय विचार एवं क्रिया का इतिहास [History of environmental thought and action]. EDUPHORIA – An International Multidisciplinary Magazine, 4(2), 78–85. https://doi.org/10.59231/EDUPHORIA/230482
Chicago Style (17th Edition): Bhardwaj, Ritu. “पर्यावरणीय विचार एवं क्रिया का इतिहास” [History of Environmental Thought and Action]. EDUPHORIA – An International Multidisciplinary Magazine 4, no. 2 (2026): 78–85. https://doi.org/10.59231/EDUPHORIA/230482.
MLA Style (9th Edition): Bhardwaj, Ritu. “पर्यावरणीय विचार एवं क्रिया का इतिहास” [History of Environmental Thought and Action]. EDUPHORIA – An International Multidisciplinary Magazine, vol. 4, no. 2, 2026, pp. 78–85, https://doi.org/10.59231/EDUPHORIA/230482.
Subject: Environmental Education / Teacher Education
Thematic Classification: Environmental Conservation, Vedic and Buddhist Perspectives on Nature, Environmental Movements in India, Sustainable Development Goals.
Introduction
मानव सभ्यता के प्रारम्भ से लेकर पर्यावरण विचार एवं क्रिया का इतिहास जाना जाता है। वैदिक काल में ही प्रकृति की उपासना की जाने लगी थी तभी से जन मानस ने मान लिया था कि यदि जीवित रहना है तो प्रकृति से सामन्जस्य स्थापित करना ही होगा। भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि हमारे ग्रन्थ जिन्हें हम संस्कृत वांग्मय भी कहते हैं] में पर्यावरण से सम्बन्धित अपूर्व ज्ञान विद्यमान है जिसमें पर्यावरण को प्रभावित करने वाले प्रत्येक जैविक तथा अजैविक तत्वों का विस्तारपूर्वक किया गया है तथा उनमें परस्पर अन्योन्याश्रय सम्बन्ध बताया गया है] सचेत भी किया है कि मनुष्य को बिना लालच किये केवल आवश्यकतानुसार ही इनका सेवन करना चाहिए। हमारे ग्रन्थों में पर्यावरण की उत्पत्ति एवं उसका विस्तार पाँच तत्वों से बताया गया है- पृथ्वी] जल] अग्नि] आकाश एवं वायु। इनका सामन्जस्य सृष्टि के विकास को दर्शाता है। ऋग्वेद में यह सभी देवता के रूप में स्थापित है।
अग्नि जोकि ऊर्जा के रूप में है, मानव के लिए कल्याणकारी होने की कामना की गई है कहा भी है%&
पृथ्वी] जोकि समस्त प्राणियों का पोषण करने वाली तथा अनेकानेक रत्नों एवं विभिन्न खनिजों को प्रदान करने वाली मातृस्वरूपा के लिए कहा गया है%&
माता भूमि पुत्राऽहंपृथ्वियाः अथर्व 12@12@
जल समस्त चराचर जगत के लिए अनिवार्य तत्व है] मनुष्य से उसके सदुपयोग एवं स्वच्छ रखने की अपेक्षा की गई है। वरूण को जल के देवता के रूप में बताया गया है। ऋग्वेद का सातवां मण्डल वरूण देव को समर्पित है। जिसमें वरूण देव से प्रार्थना की गई है कि वह अतिवृष्टि] अनावृष्टि एवं झंझावात जैसे प्रकोप से जीव-जन्तुओं की रक्षा करे। मनुस्मृति में जल को सदैव कपड़े से छानकर पीने की सलाह दी गई है।
”वस्त्रपूतं जलं पिबेत।“ (मनु0 6@43@
अग्निभावे पुरो वितय यज्ञस्य देव ऋत्विजय होतारं रत्नधातम अग्नि का मुख्य स्रोत सूर्य को माना गया है जोकि सम्पूर्ण संसार के लिए कल्याणकारी हे। सूर्य ऊर्जा का असीम भण्डार है इसी से सम्पूर्ण चराचर सृष्टि प्रकाशमान है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मानव सहित सम्पूर्ण जीव जगत् सभी संसाधनों के लिए सूर्य पर ही निर्भर है।
सूर्य आत्मा जगतस्तथुषश्च“ (यजु0 13@46@
आकाश अर्थात् अन्तरिक्ष अर्थात् असीम ऊर्जा से व्याप्त तत्व जिससे पृथ्वी की भी उत्पत्ति हुई है। एक विराट एवं शक्ति जिससे समस्त आकाशीय पिण्ड संचालित हैं] वह भी नियमपूर्वक। सूर्य को ऋग्वेद में आकाश का रत्न कहा गया है। आकाश को द्यौ नाम से इंगित किया है प्रथम मण्डल का 159 और 160 सूक्त में स्तुति वर्णित है।
वायु-यह प्राण तत्व मानते हुए देवता के रूप में प्रतिष्ठापित है। यह समस्त जीवों के अन्दर और बाहर सर्व विद्यमान है। वायु की अनुकूलता जीव के सुगम जीवन यापन तथा प्रतिकूलता विनाश का कारण बनती है। वैदिक ग्रन्थों में मानव से अपेक्षा की गई है हवन यज्ञादि पदार्थों से द्वारा एवं अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर वायु को प्रदूषित होने से बचाए।
वनस्पति वन आस्थापयध्वम्।
यज्ञात् भवति पर्यन्य। ऋग्वेद 10@101@11
उपर्युक्त विवेचन से ज्ञात होता है कि इन्हीं पंच तत्वों से पर्यावरण के निर्माण के साथ मानवीय अन्तः क्रियाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण किया तथा समस्त जीवों के अस्तित्व के लिए कल्याण की कामना की गई क्योंकि समस्त चराचर जीव जगत् इन्हीं के द्वारा आवश्यक पदार्थ प्राप्त करता है। पर्यावरण में वृक्षों को एक महत्वपूर्ण तत्व माना गया है। पर्यावरण संतुलन में वृक्षों का महत्वपूर्ण योगदान है। ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संरक्षण में वनों के महत्व को जानकर इनके वैज्ञानिक वर्गीकरण] संरक्षण तथा इनके वर्धन को महत्व दिया। वनों के विनाश का कारण ही पर्यावरणीय समस्या जैसे वैश्विक तापन] बाढ़] सूखा] वायु प्रदूषण] भूस्खलन उत्पन्न हो रही है। पद्मपुराण में भी वृक्षों के महत्व को बताया गया है। पदम पुराण] हलायुध कोश पृ0 632
पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए यज्ञ या हवन को महत्व प्रदान किया गया जिसमें विभिन्न प्रकार के औषधीय पदार्थों की आहूति दी जाती है जिनसे वातावरण कीटाणु मुक्त रहता है जैसे गुग्गुल] अगर] तगर] कपूर] लोबान आदि, गुग्गुल के लिए बताया है
“न ते यक्ष्मा असन्धते। नैनं शपथो अश्नुते।
यः भेषजं गुग्गुल्ये सुरभि गन्धो अश्नुते।“ (अथर्व 12-1@03@
वैदिक काल धर्म प्रधान काल रहा है अतः उस काल में पर्यावरण एवं प्रकृति को पशु-पक्षी सभी को किसी न किसी देवी-देवता से जोड़कर रखा गया जिससे कि मानव द्वारा अन्य जीव या वृक्ष अथवा पौधे को हानि न पहुँचा सके। स्कन्दपुराण में अलग-अलग वृक्षों के महत्व को प्रदर्शित किया गया है।
अश्वत्थ अश्वस्थं रूपयेद्यस्तु पृथिव्यां प्रयतो नरः
वस्य पाप सहस्राणि विलयं यान्ति तत्क्षणात्।।
पालाशं पलाशं सर्व देवानाधारो धर्म साधनम्
यत्र लोकस्तु तस्य रमातत्र सम्यो महातरूः।।
तुलसी तुलसी रोपिता येन गृहस्थेन महाफला।
गृहे तस्य न दारिद्रयं जायते नात्र संशयः।।
स्कन्द पुराण 6@247@38, 248@7, 249@1
श्रीमद्भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण ने अश्वत्थ को महत्वपूर्ण वृक्ष बताया हैA
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्। श्रीमदभगवत्गीता 10@26
वैदिक धर्म के पश्चात् बौद्ध धर्म में भी पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक उक्तियाँ हैं।
बौद्ध धर्म एवं पर्यावरण
1- सभी जीवों के प्रति करूणा: भगवान बुद्ध का मूल सिद्धान्त अहिंसा रहा है अतः बुद्ध ने अपने सभी अनुयायियों को समस्त जीव के प्रति करूणा एवं सहानुभूति रखने की शिक्षा दी है। अहिंसा अर्थात् समस्त जीव] चर-अचर] स्थावर] जंगम सभी को करूणा का व्यवहार अपनाते हुए किसी को हानि न पहुँचाते हुए व्यवहार को उत्तम बनाए रखना है।
2- प्रकृति के प्रति सम्मान: बुद्ध ने अपने अनुयायियों एवं समर्थकों को वन] नदी और पहाड़ों का सम्मान करने एवं रक्षा करने की शिक्षा दी है। बुद्ध की शिक्षाओं में प्रकृति पूजनीय है।
3- अभौतिक वादी: बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध ने अपने समर्थकों को लालच से बचने एवं अपनी इच्छाओं को सीमित रखने की सलाह दी हे। बुद्ध का मानना है कि जहाँ लालच होगा वहाँ नकारात्मकता में वृद्धि होगी फलस्वरूप भौतिक इच्छा में वृद्धि होगी और उसकी पूर्ति के लिए व्यक्ति कोई न कोई अनैतिक कर्म करेगा जिसका प्रथम प्रयास प्रकृति ही बनेगी। अतः उपभोग को सीमित करना एवं सादगीपूर्ण जीवन यापन करने पर बल दिया।
बौद्ध काल में पर्यावरण के प्रति सक्रियता
बौद्धकाल में पर्यावरण के प्रति जागरूकता एवं सक्रियता का एक महत्वपूर्ण इतिहास रहा है। इस धर्म पर्यावरण को एक अविभाज्य इकाई एवं संवेदनशील रूप में देखा जाता है क्योंकि इसी पर मनुष्य का जीवन और कल्याण निर्भर करता है। पर्यावरण संरक्षण हेतु बौद्ध धर्म में अनेक क्रियाएं अपनाई गई जैसे-
वृक्षारोपण: बौद्ध भिक्षुओं अपनी शिक्षा फैलाने के साथ साथ जन सामान्य को वृक्षों की कटाई से होने वाले नुकसान के विषय में जागरूक किया तथा वनों के महत्व को समझाया तथा वृक्षारोपण के लिए भी प्रेरित किया।
उपवन@अरण्यानी: बौद्ध धर्म में उपवन या अरर्ण्यानी का विशेष महत्व बताया है। बुद्ध के अनुसार उपवन देवताओं का निवास स्थान है और इनकी रक्षा करना धार्मिक कर्तव्य बताया है।
जल संरक्षण: बौद्ध भिक्षुओं ने पानी का संरक्षण करने एवं व्यर्थ न बहाने की शिक्षा दी तथा जल स्रोत की रक्षा के लिए इस काल में नहर तथा तालाबों का भी निर्माण कराया गया] नहरों पर बांध भी बनवाये गए।
अहिंसक जीवन शैली: बौद्ध धर्म में करूणा एवं समस्त जीव के प्रति प्रेम को अत्यधिक महत्व दिया है] बुद्ध की शिक्षाओं में मानव को प्रकृति के साथ-साथ सभी जीव के साथ शन्ति, प्रेम एवं सद्भाव के साथ जीवन यापन करने की शिक्षा दी गई हैं।
बौद्धधर्म में वन एवं संरक्षण के प्रति अत्यन्त करूणा का भाव अपनाया तथा उनके महत्व को भी समझा क्योंकि बुद्ध का अधिकांश जीवन घने वन] वृक्ष एवं पशुओं के मध्य ही व्यतीत हुआ। त्रिपिरक सूत्र में बुद्ध के 45 वर्षों के जीवन जोकि विभिन्न उद्यान एवं गहन शान्त वन के मध्य एकान्त वातावरण में ध्यान का अभया किया और बोधि भी वृक्ष के नीचे ही प्राप्त की। इसलिए बौद्ध भिक्षुओं ने भी विनय पिटक, सूत्र पिटक जैसे बौद्ध साहित्य की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए गृहस्थ को भी जीवों का सम्मान करने का उपदेश दिया तथा बीज एवं फलों को जानबूझकर तोड़ने व काटने से मना किया।
पर्यावरण संरक्षण हेतु ही बुद्ध ने चार्तुमास का प्रावधान बनाया जिससे कि इस वर्षाकाल में प्रकृति को कोई हानि नहीं अर्थात् नवीन अंकुरित बीज] एवं नावांकुरों को कोई भी हानि न पहुँचे। बुद्ध का कार्य कारण सिद्धान्त पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकता है।
मुगलकाल एवं पर्यावरण संरक्षण
मुगल और मुस्लिम शासकों के प्रभुत्व वाले इस काल में जंगलों को केवल शिकार के लिए चारागाह माना जाता था। शासकों के साथ&साथ जनमानस की युद्ध में अधिक रूचि थी। वैदिक काल की धारणा पृथ्वी माता की सेवा करने की अपेक्षा जनसेवा ही रूचि बन गया था। सम्राट अकबर के शासन काल को छोड़कर इस काल में पर्यावरण संरक्षण का कोई भी उचित न्याय शास्त्र प्राप्त नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त बाबर के वृतान्त, बाबरनामा में उस काल में प्राप्त वनस्पतियों एवं जीव जन्तुओं का विस्तृत तथा व्यवस्थित वर्णन मिलता है। इस मनोभाव से ज्ञात होता है कि मुगलकाल में भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति भाव सकारात्मक भी रहा है। प्रसिद्ध सम्राट जहांगीर ने कई उत्तम उद्यान तथा उनमें विचरण करने वाले जीव-जन्तु] पक्षी आदि की चित्रकारी के लिए एक बड़ी संख्या में कलाकारों को भी संरक्षण दिया। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि बेहतरीन उद्यानों का निर्माण एवं चित्रकारों को संरक्षण तथा उद्यानों में विचरण करने के लिए पशु-प्रेम पर्यावरण संरक्षण या प्रकृति के प्रति प्रेम नहीं अपितु मनोरंजन मात्र है। क्योंकि कुछ गिने चुने वृक्षों को शाही वृक्ष का दर्जा प्राप्त था जिन्हें काटने पर जुर्माना लगता था तथा वृक्षों को काटने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। कहा जा सकता है कि इस काल में वन एवं वन्य जीवों का आकार निरन्तर कम ही हुआ क्योंकि उनके संरक्षण के लिए कोई निश्चित नीतियाँ नहीं बनाई गई थीं।
वर्तमान में पर्यावरण विचार एवं क्रिया
पर्यावरण विचार एवं क्रिया का यदि इतिहास देखा जाए तो यह अत्यन्त प्राचीन है। विश्व की समस्त उन्नत सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारें ही हुआ है। पर्यावरण उस काल में जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता था। प्रत्येक पक्ष से उसका संरक्षण किया जाता था। ऐसा नहीं कि वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनमानस पूर्णतः उदासीन हो गया है नहीं, 20वीं शताब्दी में पर्यावरण संरक्षण के प्रति भावना एक आन्दोलन के रूप में दृष्टिगोचर हुई जिसके अन्तर्गत प्रदूषण] संसाधनों के प्रति शोषण एवं जलवायु परिवर्तन जैसी पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई। बढ़ता औद्योगिकीकरण एवं ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन तथा शहरों के प्रति आकर्षण होने के कारण पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनमानस विचार करने लगा फलस्वरूप 1960 से 1970 के मध्य पर्यावरण के प्रति वचार जिसे हम पर्यावरणवाद भी कह सकते हैं] का उदय हुआ।
प्रथम विश्व सम्मेलन 1972 में स्टॉकमोह में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन जोकि पर्यावरण पर ही आधारित था] ने पर्यावरण को प्रमुख मुद्दा बनाने वाला प्रथम विश्व सम्मेलन था। स्टॉकहोम सम्मेलन के घोषणा-पत्र और मानव पर्यावरण के लिए अनेक प्रस्ताव सम्मिलित थे। जिसमें प्रतिभागियों ने पर्यावरण के उत्तम प्रबन्धन के लिए निर्धारित कई सिद्धान्तों को अपनाया। कार्य योजना में तीन मुख्य श्रेणियाँ सम्मिलित थीं:
वैश्विक पर्यावरण मूल्यांकन कार्यक्रम
पर्यावरण प्रबन्धन गतिविधियाँ
अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर किये जाने वाले मूल्यांकन और प्रबन्धन गतिविधियों को समर्थन देने के दिए गए उपाय।
उपर्युक्त तीन मुख्य श्रेणियों को 109 सिफारिशों में भी विभाजित किया गया था। परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यू एन ई पी का निर्माण हुआ।
भारत में पर्यावरण आन्दोलन विचार एवं क्रिया
विश्नोई आन्दोलन-राजस्थान के जोधपुर जिलें में अमृता देवी विश्नोई ने अपने गांव के पेड़ों को बचाने के लिए जान दे दी थी। यह आन्दोलन 1730 में हुआ और चिपकों आन्दोलन के लिए प्रेरणास्रोत बना।
चिपको आन्दोलन: जहाँ पंचतत्व प्रत्यक्षतः ईश्वर रूप में पूजनीय हों वहाँ भी वृक्षों की कटाई को रोकने के लिए एक अनोखा आन्दोलन 1973 के दशक में गढ़वाल क्षेत्र में प्रारम्भ हुआ।
नर्मदा बचाओ: 1985 में प्रारम्भ हुआ यह आन्दोलन एक सामाजिक रूप में प्रकट हो गया। इसका मुख्य उद्देश्य नर्मदा नदी पर बनने वाले बांधों के विरूद्ध था।
पर्यावरण आन्दोलन के परिणामस्वरूप अनेक नीति एवं कानून का निर्माण हुआ जिससे पर्यावरण संरक्षण के प्रति निरन्तर चिन्तन एवं क्रियान्वयन की ओर सरकार एवं समाज का भी ध्यान गया। परिणामतः वन्य जीव संरक्षण एवं उनके आवास के लिए विशेष प्रयास किये जा रहे हैं।
अप्पिको आन्दोलन: यह आन्दोलन कर्नाटक राज्य में 1983 में पेड़ों की रक्षा के लिए जाना जाता है।
टिहरी बांध विरोधी आन्दोलन: 1980 के दशक में यह एक महत्वपूर्ण पर्यावरण व सामाजिक आन्दोलन था।
जंगल बचाओ आन्दोलन: यह आन्दोलन 1980 के दशक में झारखण्ड तत्कालीन बिहार में आरम्भ हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक जंगलों को व्यावसायिक सागौन के बागानों में बदलने की योजना के विरोध में था।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अन्य आन्दोलन भी किये गए परिणामतः संरक्षण के प्रति सतत् विकास की अवधारणा का उदय हुआ। किसी भी परिवर्तन का प्रारम्भ में जागरूकता अनिवार्य है और यह जागरूकता शिक्षा के माध्यम से अतिशीघ्रता से प्रसारित होती है। पर्यावरण संरक्षण हेतु विभिन्न प्रकार के कानून व नीतियों का निर्माण हुआ, प्रदूषण नियन्त्रण के लिए सरकार ने विभिन्न समितियों का गठन किया एवं कार्यों की समीक्षा भी की, जिसमें 2030 तक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित परिस्थिकिी तन्त्र को गैर जीवाश्म ईंधन के माध्यम से विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा। भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) जिसमें जलवायु परिवर्तन पर विशिष्ट ज्ञान के साथ विशिष्ट क्षेत्रों में यथाः सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता] जल, कृषि, सतत् आवास, हरित भारत, मानव स्वास्थ्य एवं जलवायु परिवर्तन, हिमालय परिस्थितिकी तंत्र मिशन सम्मिलित हैं।
हरित भारत के राष्ट्रीय मिशन (GIM) आठ मिशन में से सर्वोपरि मिशन हैं] जिसका उद्देश्य भारत के वन क्षेत्र की रक्षा, पुर्नस्थापना एवं उसका संवर्धन करना है।
स्वच्छ भारत मिशन, शहरी कायाकल्प और अटल कायाकल्प] शहरी परिवर्तन] स्मार्ट सिटी मिशन, प्रधानमन्त्री शहरी आवास योजना, मैट्रो रेल परियोजनाएं भी कार्बन स्टॉक, जैव विविधता एवं पर्यावरण-पर्यटन के अवसर बढ़ाने एवं स्थानीय समुदायों के लिए अमृत धरोहर योजना जैसी योजनाओं के साथ तट रेखा संरक्षण हेतु एन जी एम के द्वारा भी अनुकूल उपाय भी सरकार द्वारा किये जा रहे हैं। किन्तु मात्र सरकार द्वारा की गई घोषणाओं, बनाई गई नीतियों के लिए जन सामान्य को भी अपनी शत-प्रतिशत भूमिका निभानी होगी।
राज्य स्तर पर भी राज्य जलवायु परिवर्तन प्रकोष्ठ का गठन करके अन्तर क्षेत्रीय प्राथमिकता कार्यों की रूपरेखा तैयार कर लागू करने का प्रावधान है। जल प्रदूषण एवं नदियों के पुनरूद्धार के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम का आरम्भ किया गया जिसके अन्तर्गत नदी पुनरूद्धार के साथ वन व जलवायु परिवर्तन मन्त्रालय द्वारा जल की गुणवत्ता मानदण्ड को पूरा करना है।
वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सन् 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को आरम्भ किया गया जिसका लक्ष्य 2024 तक पी एम 10 और पी एम 2-5 सान्द्रता में 20 से 30 प्रतिशत की कमी लाना था। शहर विशिष्ट स्वच्छ वायु कार्य योजनाएं भी तैयार हुई तथा क्रियान्वयन भी हुआ।
बंजर भूमि के पुनरूद्धार एवं भूमि क्षरण के प्रति, भूमि संसाधनों के उचित प्रयोग पर ध्यान केन्द्रित करने] जैव विविधता के संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग एवं संरक्षण पर सरकार ने अनेक योजनाओं को प्रारम्भ किया, जिन पर कार्य भी हो रहा है।
राष्ट्रीय कार्य योजना] सतत् आवास पर राष्ट्रीय आवास योजना, राष्ट्रीय जल मिशन, हरित भारत मिशन, सतत् कृषि के लिए मिशन, जलीय परिस्थितिकी तन्त्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय योजना एन0पी0सी0ए0, बायो स्फीयर रिजर्व] स्थानांतरित खेती क्षेत्रों में वाटर शेड विकास परियोजना, जल निकायों की मरम्मत, नवीनीकरण और पुनरूद्धार के लिए जल संसाधन कार्यक्रम, प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबन्धन और योजना प्राधिकरण जैसी विभिन्न योजनाएं क्रियाशील हैं।
आज मानवता के समक्ष पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भयावह रूप से मुंह खोले खड़ी है। अतः बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वाहनों का बढ़ता प्रयोग, परमाणु पदार्थों की समस्या, जनसंख्या वृद्धि, वन सम्पदा का विनाश] कृषि में प्रयुक्त कीट नाशक, रासायनिक मिश्रण, अनियोजित वैज्ञानिक विकास जैसे कारण ही हैं जो पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं।
वस्तुतः प्राचीन भारतीय साहित्य से लेकर आधुनिक साहित्य में पर्यावरण संरक्षण हेतु तथा अपने पंचतत्वों की रक्षा एवं संवर्धन हेतु, स्वच्छ रखने हेतु ऋषि&मुनि, कवि, लेखक, पर्यावरणविद् अपने विचारों से मानव को समय-समय पर सचेत कर रहे हैं। आज समय आ गया है जब हमें प्रकृति की ओर लौटना होगा, संरक्षण करना होगा। वायु की शुद्धता के लिए वन एवं उपवन, पौधे, वृक्ष जिन्हें पुराणों में पूजनीय तथा औषधि रूप में प्रयुक्त किया व बताया गया है। उनका सम्मान करना होगा, बचाना होगा। तभी हम शान्ति, सद्भाव, प्रेम एवं मित्रता के साथ सुन्दर पृथ्वी को निवास योग्य बनाकर विश्व में अनुकरणीय संदेश दे पाएंगें।
यह कार्य अपेक्षित है] हमारी शिक्षा द्वारा छात्रों को जागरूक बनाकर, स्वयं को, समाज को जागरूक करके किन्तु पहल भविष्य निर्माता शिक्षक से ही करनी होगी क्योंकि वही भविष्य निर्माता है राष्ट्र का बहिष्कार करना होगा यूटयूब यूनिवर्सिटी का अनर्गल संदेश देने वाले सामाजिक चैनल, व्हाटसएप का लौटना होगा पुस्तकों की ओर जब तक हम पुस्तकों का अध्ययन नहीं करेगें ज्ञान का स्थायित्व नहीं होगा जिसके अभाव में युवा समाज में किसी भी कार्य को करने की उमंग एवं प्रेरणा का अभाव होगा। अतः हमें अपनी युवा शक्ति से ही सरकार द्वारा संचालित योजनाओं में भरपूर सहयोग देने की अपेक्षा है।
Statements & Declarations
Author’s Contribution: Prof. Ritu Bhardwaj is the sole author of this research. She conceptualized the study, conducted a comprehensive review of Vedic, Buddhist, and Mughal historical perspectives on the environment, analyzed modern environmental movements in India, and synthesized the findings into the final manuscript.
Peer Review: This article has undergone a double-blind peer-review process organized by the Editorial Board of EDUPHORIA. Reviewers and authors remained mutually anonymous throughout the evaluation.
Competing Interests: The author declares no financial or personal conflicts of interest regarding the publication of this research.
Funding: No specific grant was received from any public or commercial funding agency for this research.
Data Availability: The research is a historical and theoretical analysis based on secondary sources including the Rigveda, Atharvaveda, Manu Smriti, Skanda Purana, and contemporary government reports, all of which are cited within the bibliography.
Ethical Approval: As this study relies on literature review and historical analysis, it did not involve direct human or animal subjects.
License: This work is published by ICERT and follows standard open-access multidisciplinary journal guidelines.
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1- आर ए शर्मा, पर्यावरण शिक्षा, आर0 लाल बुक डिपो, मेरठ, 2007
2- डॉ0 गजेन्द्र सिंह तोमर, पर्यावरण शिक्षा, आर0 लाल बुक डिपो, 2008
3- www.jagranjosh.com
4- www.greengrace.org
Bibliography
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2- Dr. Gajendra Singh Tomar, Environmental Education, R. Lal Book Depot, 2008
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